ग़ज़ल
दौलत पाय न कीजिए
दौलत पाय न कीजिए, सपनेहु अभिमान।चंचल जल दिन चारिको, ठाउं न रहत निदान॥
ठाउं न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै।मीठे बचन सुनाय, विनय सबही की कीजै॥
कह 'गिरिधर कविराय अरे यह सब घट तौलत।पाहुन निसिदिन चारि, रहत सबही के दौलत॥
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