घनानंद

घनानंद

1673-1760
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

अंतर मैं बसी पै प्रवासी कैसो अंतर है,मेरी न सुनत दैया ! आपनीयौ ना कहौ.
अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।तहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौ झिझकैं कपटी जे निसाँक नहीं॥
इन बाट परी सुधि रावरे भूलनि,कैसे उराहनौ दीजिए जू.
एरे बीर पौन ,तेरो सबै ओर गौन, बारीतो सों और कौन मनौं ढरकौंहीं बानि दै.
कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै,:आँसू नदी नैनन उमँगिऐ रहति है ।
कारी कूर कोकिल कहाँ को बैर काढ़ति री,कूकि कूकि अबही करेजो किन कोरि रै.
खेलत खिलार गुन-आगर उदार राधानागरि छबीली फाग-राग सरसात है ।
’घनाआनँद’ जीवन मूल सुजान की , कौंधनि हू न कहूँ दरसैं ।सु न जानिये धौं कित छाय रहे, दृग चातक प्रान तपै तरसैं ॥
’घनआनँद’ प्यारे कहा जिय जारत, छैल ह्वै फीकिऐ खौरन सों ।करि प्रीति पतंग कौ रंग दिना दस, दीसि परै सब ठौरन सों ॥
छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद::तृषित चषनि लाल, कबधौ दिखाय हौ।
जासों प्रीति ताहि निठुराई सों निपट नेह,कैसे करि जिय की जरनि सो जताइये।
जिन आँखिन रूप-चिन्हार भई,तिनको नित ही दहि जागनिहै.
जिय की बात जनाइये क्यों करि,जान कहाय अजाननि आगौ.
झलकै अति सुन्दर आनन गौर, छके दृग राजत काननि छ्वै।हँसि बोलनि मैं छबि फूलन की बरषा, उर ऊपर जाति है ह्वै।
तब तौ छबि पीवत जीवत है अब सोचन लोचन जात जरेहित-पोष के तोष सुप्राण पले बिललात महादुख दोष भरे.
दसन बसन बोली भरि ए रहे गुलाल:हँसनि लसनि त्यों कपूर सरस्यौ करै ।
निसि द्यौस खरी उर माँझ अरी छबि रंग भरी मुरि चाहनि की.तकि मोरनि त्यों चख ढोरि रहैं,ढरिगो हिय ढोरनि बाहनि की.
परकाजहि देह को धारि फिरौ परजन्य जथारथ ह्वै दरसौ।निधि-नीर सुधा के समान करौ सबही बिधि सज्जनता सरसौ।
पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों फिरि तेहिकै तोरियै जू.निरधार अधार है झार मंझार दई, गहि बाँह न बोरिये जू .
पिय के अनुराग सुहाग भरी, रति हेरौ न पावत रूप रफै ।रिझवारि महा रसरासि खिलार, सुगावत गारि बजाय डफै ॥
पीरी परी देह छीनी, राजत सनेह भीनी,:कीनी है अनंग अंग-अंग रंग बोरी सी ।
पूरन प्रेम को मंत्र महा पन, जा मधि सोधि सुधारि है लेख्यौ।ताही के चारू चरित्र बिचित्रनि यौं पचि कै राचि राखि बिसेख्यौं
राधा राधा राधा कहौं ।कहि कहि राधा राधा लहौं ॥१॥
प्रेम को महोदधि अपार हेरि कै, बिचार,बापुरो हहरि वार ही तैं फिरि आयौ है।
बरसैं तरसैं सरसैं अरसैं न, कहूँ दरसैं इहि छाक छईं।निरखैं परखैं करखैं हरखैं उपजी अभिलाषनि लाख जईं।