ग़ज़ल

घनआनँद जीवन मूल सुजान की

घनानंद · सब कलाम देखें
’घनाआनँद’ जीवन मूल सुजान की , कौंधनि हू न कहूँ दरसैं ।सु न जानिये धौं कित छाय रहे, दृग चातक प्रान तपै तरसैं ॥बिन पावस तो इन्हें थ्यावस हो न, सु क्यों करि ये अब सो परसैं।बदरा बरसै रितु में घिरि कै, नितहीं अँखियाँ उघरी बरसैं ॥
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