ग़ज़ल
अंतर मैं बासी
अंतर मैं बसी पै प्रवासी कैसो अंतर है,मेरी न सुनत दैया ! आपनीयौ ना कहौ.लोचननि तारे ह्वै सुझायो सब,सूझी नाहीं,बुझि न परति ऐसी सोचनि कहा दहौ.हौ तौ जानराय,जाने जाहु न अजान यातें,आँनंद के घन छाया छाय उघरे रहौ .मूरति मया की हा हा! सूरति दिखैऐ नेकु,हमैं खोय या बिधि हो!कौन धी लहालहौ.
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