ग़ज़ल

कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै

घनानंद · सब कलाम देखें
कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै,:आँसू नदी नैनन उमँगिऐ रहति है ।कहाँ ऐसी राँचनि हरद-केसू-केसर में,:जैसी पियराई गात पगिए रहति है ॥चाँचरि-चौपहि हू तौ औसर ही माचति, पै-:चिंता की चहल चित्त लगिऐ रहति है ।तपनि बुझे बिन ’आनँदघन’ जान बिन,:होरी सी हमारे हिए लगिऐ रहति है ॥
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