बोधा
1747-1802
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
अति छीन मृनाल के तारहु ते, तेहि ऊपर पाँव दै आवनो है।
सुई बेह ते द्वार सकीन तहाँ, परतीति को हाँड़ो दावनो है॥
कबहूँ मिलिबो, कबहूँ मिलिबो, यह धीरज ही मैं धरैबो करै।
उर ते कढ़ि आवै गरै तें फिरै, मन की मनहीं मैं सिरैबो करै॥
कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी, को दया सुनि कै उर आनतु है।
अरु पीर घटै तजि धीर सखी, दु:ख को नहीं का पै बखानतु है॥
काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी ।
पातहू के खरके छरकै धरकै उर लाय रहै सुकुमारी ।
कूक न मारु कोइलिया, करि-करि तेह ।
लागि जाति बिरहिनि कै, दुबरी देह॥
कूर मिले मगरूर मिले, रनसूर मिले धरे सूर प्रभा को।
ज्ञानी मिले औ गुमानी मिले, सनमानी मिले छबिदार पता को॥
खरी सासु घरी न छमा करिहैं, निसिबासर त्रासन हीं मरबी।
सदा भौंहे चरहै ननदी, यों जेठानी की तीखी सुनै जरबी॥
लोक की लाज औ सोच प्रलोक को, वारिये प्रीति के ऊपर दोऊ।
गाँव को गेह को देह को नातो, सनेह मैं हाँ तो करै पुनि सोऊ ॥
वह प्रीति की रीति को जानत थो, तबहीं तो बच्यो गिरि ढाहन तैं।
गजराज चिकारि कै प्रान तज्यो, न जरयो सँग होलिका दाहन तैं॥
हिलि मिलि जानै तासोँ मिलिकै जनावै हेत ,
हित को न जानै ताको हितू न बिसाहिये ।