ग़ज़ल
कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी
कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी, को दया सुनि कै उर आनतु है।अरु पीर घटै तजि धीर सखी, दु:ख को नहीं का पै बखानतु है॥
'कवि बोधा कहै में सवाद कहा, को हमारी कही पुनि मानतु है।हमैं पूरी लगी कै अधूरी लगी, यह जीव हमारोई जानतु है॥
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