ग़ज़ल
कबँ मिलिबो कबँ मिलिबो
कबहूँ मिलिबो, कबहूँ मिलिबो, यह धीरज ही मैं धरैबो करै।उर ते कढ़ि आवै गरै तें फिरै, मन की मनहीं मैं सिरैबो करै॥'कवि बोधा' न चाउसरी कबहूँ, नित की हरवा सो हिरैबो करै।सहते ही बनै, कहते न बनै, मन ही मन पीर पिरैबो करै॥
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