ग़ज़ल
खरी सासु घरी न छमा करिहैं
खरी सासु घरी न छमा करिहैं, निसिबासर त्रासन हीं मरबी।सदा भौंहे चरहै ननदी, यों जेठानी की तीखी सुनै जरबी॥
'कवि बोधा न संग तिहारो चहैं, यह नाहक नेक फँदा परबी।बऑंखें तिहारी लगैं ये लली, लगि जैहें कँ तो कहा करबी॥
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