ग़ज़ल
वह प्रीति की रीति को जानत थो
वह प्रीति की रीति को जानत थो, तबहीं तो बच्यो गिरि ढाहन तैं।गजराज चिकारि कै प्रान तज्यो, न जरयो सँग होलिका दाहन तैं॥
'कवि बोधा कछू न अनोखी यहै, का बनै नहीं प्रीति निबाहन तैं।प्रह्लाद की ऐसी प्रतीति करै, तब क्यों न कप्रभु पाहन तैं॥
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