विद्यापति

विद्यापति

1352-1448
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

अगहन दिन उत्तम सुख-सुन्दर घर-घर सारी समायरतन बयस सँ मोन सुख सुन्दर से छोड़ने कोना जायव
अभिनव कोमल सुन्दर पात।सगर कानन पहिरल पट रात।
अभिनव पल्लव बइसंक देल।धवल कमल फुल पुरहर भेल।।
सखि हे, आज जाएब मोहि।।घर गुरूजन-डर न मानब, वचन चूकब नाहि।।
अम्बर बदन झपाबह गोरि।राज सुनइ छिअ चांदक चोरि।।
अयलऊँ हे बड़का बाबानगरा तोहार हे
आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन, बदन मलिन भेल तारो।मन्द वचन तोहि कओन कहल अछि, से न कहिअ किअ मारो।
आजु नाथ एक व्रत मोहि सुख लागत हे .तोहें सिव धरि नट वेष कि डमरू बजाएव हे.
आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे।तोहे सिव धरु नट भेस कि डमरू बजाबह हे। ।
आदरे अधिक काज नहि बन्ध।माधव बुझल तोहर अनुबन्ध।।
आदरें अधिक काज नहि बंध।माधव बूझल तोहर अनुबंध।।
आसक लता लगाओल सजनी, नयनक नीर पटाय।से फल आब परिनत भेल मजनी, आँचर तर न समाय।।
आहे सखि आहे सखि लए जनि जाह। हम अति बालिका निरदए नाह।गोट-गोट सखि सब गेलि बहराए। बजर केवाड़ पहु देलन्हि लगाए।
आहे सधि आहे सखि लय जनि जाह।हम अति बालिक आकुल नाह।।
इनती करै छी भैरवनाथमिनती करै छी
इनती करै छी हे ब्राह्मण मिनती करै छीमिनती करै छी हे ब्राह्मण
उचित बसए मोर मनमथ चोर !चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर !
उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर।बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल।
ए धनि माननि करह संजात।तुअ कुच हेमघाट हार भुजंगिनी ताक उपर धरु हाथ।।
एत जप-तप हम की लागि कयलहु,कथि लय कयल नित दान।
कंटक माझ कुसुम परगास।भमर बिकल नहि पाबय पास।।
कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ।दुखहि जनम भेल दुखहि गमाओल
कखन हरब दुख मोर, हे भोलानाथ।दुखहि जनम भेल, दुखहि जिवन गेल, सपनहु नहि सुख मोर।
कनक-भूधर-शिखर-बासिनीचंद्रिका-चय-चारु-हासिनि
कान्ह हेरल छल मन बड़ साध।कान्ह हेरइत भेलएत परमाद।।