ग़ज़ल
आजु दोखिअ सखि बड़
आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन, बदन मलिन भेल तारो।मन्द वचन तोहि कओन कहल अछि, से न कहिअ किअ मारो।आजुक रयनि सखि कठि बितल अछि, कान्ह रभस कर मंदा।गुण अवगुण पहु एकओ न बुझलनि, राहु गरासल चंदा।।अधर सुखायल केस असझासल, धामे तिलक बहि गेला।बारि विलासिनि केलि न जानथि, भाल अकण उड़ि गेला।।भनइ विद्यापति सुनु बर यौवति, ताहि कहब किअ बाधे।जे किछु पहुँ देल आंचर बान्हि लेल, सखि सभ कर उपहासे।।
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