ग़ज़ल
अभिसार
सखि हे, आज जाएब मोहि।।घर गुरूजन-डर न मानब, वचन चूकब नाहि।।चाँदन आनि-आनि अंग लेपब, भूषण कए गजमोती।।अंजन विहुँन लोचन-युगल धरत धवल जोती।।धवन बसनें तनु झपाओब गमन करब मन्दा।।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.