सूरदास

सूरदास

1478-1583
महाकवि सूरदास भक्तिकाल की सगुण धारा के शिखर कवि थे। उनके कृष्ण-लीला से भरे पद "सूरसागर" में संकलित हैं।
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Famous Works

अंखियां हरि-दरसन की भूखी।कैसे रहैं रूप-रस रांची ये बतियां सुनि रूखी॥
अंखियां हरि–दरसन की प्यासी।देख्यौ चाहति कमलनैन कौ¸ निसि–दिन रहति उदासी।।
अजहूँ चेति अचेतसबै दिन गए विषय के हेत।
अति सूख सुरत किये ललना संग जात समद मन्मथ सर जोरे ।राती उनीदे अलसात मरालगती गोकुल चपल रहतकछु थोरे ।
अद्भुत एक अनुपम बाग ॥ध्रु०॥जुगल कमलपर गजवर क्रीडत तापर सिंह करत अनुराग ॥१॥
आछो गात अकारथ गार्‌यो।करी न प्रीति कमललोचन सों, जनम जनम ज्यों हार्‌यो॥
अब कै माधव, मोहिं उधारि।मगन हौं भव अम्बुनिधि में, कृपासिन्धु मुरारि॥
अब मैं जानी देह बुढ़ानी ।सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दसा सिरानी।
अब या तनुहिं राखि कहा कीजै।सुनि री सखी, स्यामसुंदर बिनु बांटि विषम विष पीजै॥
अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल।काम क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल॥
अबिगत गति कछु कहति न आवै।ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
अरी तुम कोन हो री बन में फूलवा बीनन हारी।रतन जटित हो बन्यो बगीचा फूल रही फुलवारी॥१॥
आई छाक बुलाये स्याम।यह सुनि सखा सभै जुरि आये, सुबल सुदामा अरु श्रीदाम॥
आजु मैं गाइ चरावन जैहौं।बृन्दावन के भांति भांति फल अपने कर मैं खेहौं॥
आजु हौं एक-एक करि टरिहौं।के तुमहीं के हमहीं, माधौ, अपुन भरोसे लरिहौं।
आनि सँजोग परैभावी काहू सौं न टरै।
उधो मनकी मनमें रही ॥ध्रु०॥गोकुलते जब मथुरा पधारे । कुंजन आग देही ॥१॥
उपमा हरि तनु देखि लजानी।कोउ जल मैं कोउ बननि रहीं दुरि कोउ कोउ गगन समानी॥
ऊधो, मन माने की बात।दाख छुहारो छांड़ि अमृतफल, बिषकीरा बिष खात॥
ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।बृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं॥
ऊधो, हम लायक सिख दीजै।यह उपदेस अगिनि तै तातो, कहो कौन बिधि कीजै॥
ऊधो, होहु इहां तैं न्यारे।तुमहिं देखि तन अधिक तपत है, अरु नयननि के तारे॥
ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥
ऊधौ,तुम हो अति बड़भागी.अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी.
ऐसी प्रीति की बलि जाऊं।सिंहासन तजि चले मिलन कौं, सुनत सुदामा नाउं।
ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी ऐसी भक्ति ।सरवस त्याग मगन होय नाचे जनम करम गुन गावे ॥ उ०॥ध्रु०॥
ऐसे संतनकी सेवा । कर मन ऐसे संतनकी सेवा ॥ध्रु०॥शील संतोख सदा उर जिनके । नाम रामको लेवा ॥ क०॥१॥
ऐसैं मोहिं और कौन पहिंचानै।सुनि री सुंदरि, दीनबंधु बिनु कौन मिताई मानै॥
ऐसो पूत देवकी जायो।चारों भुजा चार आयुध धरि, कंस निकंदन आयो ॥१॥
औरन सों खेले धमार श्याम मोंसों मुख हू न बोले।नंदमहर को लाडिलो मोसो ऐंठ्यो ही डोले॥१॥
कनक रति मनि पालनौ, गढ्यो काम सुतहार ।बिबिध खिलौना भाँति के, गजमुक्ता चहुँधार ॥
कन्हैया हालरू रे ।गुढि गुढि ल्यायो बढई धरनी पर डोलाई बलि हालरू रे ॥१॥
कब तुम मोसो पतित उधारो।पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो॥