ग़ज़ल
उपमा हरि तनु देखि लजानी
उपमा हरि तनु देखि लजानी।कोउ जल मैं कोउ बननि रहीं दुरि कोउ कोउ गगन समानी॥मुख निरखत ससि गयौ अंबर कौं तडि़त दसन-छबि हेरि।मीन कमल कर चरन नयन डर जल मैं कियौ बसेरि॥भुजा देखि अहिराज लजाने बिबरनि पैठे धाइ।कटि निरखत केहरि डर मान्यौ बन-बन रहे दुराइ॥गारी देहिं कबिनि कैं बरनत श्रीअंग पटतर देत।सूरदास हमकौं सरमावत नाउं हमारौ लेत॥
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