सेनापति
1589-1649
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Famous Works
वर्षा
‘सेनापति’ उनए गए जल्द सावन कै ,
केतकि असोक, नव चंपक बकुल कुल,
कौन धौं बियोगिनी को ऐसो बिकरालु है।
केतो करौ कोई,पैए करम लिखोई, ताते,
दूसरी न होई,उर सोई ठहराईए.
चौरासी समान, कटि किंकिनी बिराजत है,
साँकर ज्यों पग जुग घूँघरू बनाइ है ।
तब न सिधारी साथ, मीड़त है अब हाथ,
सेनापति जदुनाथ बिना दुख ए सहैं ।
तुम करतार, जन-रच्छा के करनहार,
पुजवनहार मनोरथ चित चाहे के।
दूरि जदुराई सेनापति सुखदाई देखौ,
आई ऋतु पावस न पाई प्रेमपतियाँ.
नवल किसोरी भोरी केसर ते गोरी, छैल-
होरी में रही है मद जोबन के छकि कै ।
नाहीं नाहीं करै,थोडो माँगे सब दैन कहै,
मंगल को देखि पट देत बार बार है .
फूलन सों बाल की, बनाई गुही बेनी लाल,
भाल दीनी बेंदी, मृगमद की असित है।
बानि सौं सहित सुबरन मुँह रहैं जहाँ,
धरत बहुत भाँति अरथ समाज को.
बालि को सपूत कपिकुल पुरहूत,
रघुवीर जू को दूत धरि रूप विकराल को.
बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि,
ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं।
महा मोहकंदनि में जगत जकंदनि में,
दिन दुखदुंदनि में जात है बिहाय कै।
रावन को बीर 'सेनापति रघुबीर जू की,
आयो है सरन, छाँडि ताही मद अंध को।
लाल-लाल टेसू, फूलि रहे हैं बिसाल संग,
स्याम रंग भेंटि मानौं मसि मैं मिलाए हैं।
सिवजू की निध्दि, हनूमान की सिध्दि,
बिभीषण की समृध्दि, बालमीकि नैं बखान्यो है।
सेनापति उनए नए जलद सावन के
चारिहू दिसान घुमरत भरे तोय कै.
'सेनापति ऊँचे दिनकर के चलत लुवैं,
नदी नद कुवें कोपि डारत सुखाइ कै।
सोहति उतंग, उत्तमंग ससि संग गंग,
गौरि अरधंग, जो अनंग प्रतिकूल है।