ग़ज़ल
चौरासी समान, कटि किंकिनी बिराजत है
चौरासी समान, कटि किंकिनी बिराजत है,साँकर ज्यों पग जुग घूँघरू बनाइ है ।दौरी बे सँभार, उर-अंचल उघरि गयौ,उच्च कुच-कुंभ, मनु चाचरि मचाई है ॥लालन गुपाल, घोरि केसर कौ रंग लाल,भरि पिचकारी मुँह ओर कों चलाई है ।सेनापति धायौ मत्त काम कौ गयंद जानि,चोप करि चंपै, मानों चरखी छुटाइ है ॥
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