ग़ज़ल
सोहति उतंग, उत्तमंग ससि संग गंग
सोहति उतंग, उत्तमंग ससि संग गंग,गौरि अरधंग, जो अनंग प्रतिकूल है।देवन कौं मूल, 'सेनापति अनुकूल, कटिचाम सारदूल को, सदा कर त्रिसूल है॥कहा भटकत! अटकत क्यौं न तासौं मन,जातैं आठ सिध्दि, नव निध्दि रिध्दि तू लहै।लेत ही चढाइबे को, जाके एक बेलपात,चढत अगाऊ हाथ, चारि फल-फूल है॥
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