अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
1865-1947
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Famous Works
जो बहुत बनते हैं उनके पास से,
चाह होती है कि कैसे टलें।
बन भोले क्यों भोले भाले कहलावें।
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।
देश को जिस ने जगाया जगे सोने न दिया।
आग घर घर में बुरी फूट को बोने न दिया।1।
प्यार के साथ सुधाधाार पिलाने वाली।
जी-कली भाव विविधा संग खिलाने वाली।
खोजे खोजी को मिला क्या हिन्दू क्या जैन।
पत्ता पत्ता क्यों हमें पता बताता है न।1।
ढाल पसीना जिसे बड़े प्यारों से पाला।
जिसके तन में सींच सींच जीवन-रस डाला।
आ री नींद, लाल को आ जा।
उसको करके प्यार सुला जा।।
आँख का आँसू ढलकता देख कर।
जी तड़प करके हमारा रह गया।
बाढ़ में जो बहे न बढ़ बोले।
किसलिए तो बहुत बढ़े आँसू।
दिल मचलता ही रहता है ।
सदा बेचैनी रहती है ।
जी न बदला न रंगतें बदलीं।
चाल बदली नहीं दिखाती है।
लोक को रुलाता जो था राम ने रुलाया उसे
हम खल खलता के खले हैं कलपते।
कुछ उरों में एक उपजी है लता।
अति अनूठी लहलही कोमल बड़ी।
सज्जनो! देखिए, निज काम बनाना होगा।
जाति-भाषा के लिए योग कमाना होगा।1।
वेदों की है न वह महिमा धर्म ध्वंस होता।
आचारों का निपतन हुआ लुप्त जातीयता है।
जाति ममता मोल जो समझें नहीं।
तो मिलों से हम करें मैला न मन।
वही हैं मिटा देते कितने कसाले।
वही हैं बड़ों की बड़ाई सम्हाले।
क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता।
बिन कहे भी रहा नहीं जाता।1।
जलप्रवाह में एक काठ का टुकड़ा बहता जाता था।
उसे देख कर बार बार यह मेरे जी में आता था।
मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ ।
एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा ।
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
बड़े ही ढँगीले बड़े ही निराले।
अछूती सभी रंगतों बीच ढाले।
वर-विवेक कर दान सकल-अविवेक निवारे।
दूर करे अविनार सुचारु विचार प्रचारे।
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं
रचती है कविता-सुधा सुधासिक्त अवलेह।
लहता है रससिध्द कवि अजर अमर यश-देह।1।