ग़ज़ल
अनूठी बातें
जो बहुत बनते हैं उनके पास से,चाह होती है कि कैसे टलें।जो मिलें जी खोलकर उनके यहाँचाहता है कि सर के बल चलें॥
और की खोट देखती बेला,टकटकी लोग बाँध लेते हैं।पर कसर देखते समय अपनी,बेतरह आँख मूँद लेते हैं॥
तुम भली चाल सीख लो चलना,और भलाई करो भले जो हो।धूल में मत बटा करो रस्सी,आँख में धूल ड़ालते क्यों हो॥
सध सकेगा काम तब कैसे भला,हम करेंगे साधने में जब कसर?काम आयेंगी नहीं चालाकियाँजब करेंगे काम आँखें बंद कर॥
खिल उठें देख चापलूसों को,देख बेलौस को कुढे आँखें।क्या भला हम बिगड़ न जायेंगे,जब हमारी बिगड़ गयी आँखें॥
तब टले तो हम कहीं से क्या टले,डाँट बतलाकर अगर टाला गया।तो लगेगी हाँथ मलने आबरूहाँथ गरदन पर अगर ड़ाला गया॥
है सदा काम ढंग से निकलाकाम बेढंगापन न देगा कर।चाह रख कर किसी भलाई की।क्यों भला हो सवार गर्दन पर॥
बेहयाई, बहक, बनावट नें,कस किसे नहीं दिया शिकंजे में।हित-ललक से भरी लगावट ने,कर लिया है किसी ने पंजे में॥
फल बहुत ही दूर छाया कुछ नहींक्यों भला हम इस तरह के ताड़ हों?आदमी हों और हों हित से भरे,क्यों न मूठी भर हमारे हाड़ हों॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.