ग़ज़ल
उलटी समझ
जाति ममता मोल जो समझें नहीं।तो मिलों से हम करें मैला न मन।देश-हित का रंग न जो गाढ़ा चढ़ा।तो न डालें गाढ़ में गाढ़ा पहन।1।
धूल झोंकें न जाति आँखों में।फाड़ देवें न लाज की चद्दर।दर बदर फिर न देश को कोसें।मूँद हित दर न दें पहन खद्दर।2।
तो गिना जाय क्यों न खुदरों में।क्यों उगा दे न बीज बरबादी।काम की खाद जो न बन पाई।देश-हित-खेत के लिए खादी।3।
हित सचाई बिना नहीं होगा।लोग ताना अनेक तन देखें।कात लें सूत, लें चला करघे।सैकड़ों गज गजी पहन देखें।4।
पैन्ह मोटा न पेट मोटा हो।सब बुरी चाट बाँट में न पड़े।छल कपट का न पैन्ह लें जामा।हथ-कते सूत के पहन कपड़े।5।
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