ग़ज़ल
कविकीर्ति
रचती है कविता-सुधा सुधासिक्त अवलेह।लहता है रससिध्द कवि अजर अमर यश-देह।1।
चीरजीवी हैं सुकवि जन सब रस-सिध्द समान।उक्ति सजीवन जड़ी को कर सजीवता दान।2।
अमल धावल आनन्द मय सुधा सिता सुमिलाप।है कमनीय मयंक सम कविकुल कीर्ति कलाप।3।
गौरव-केतन से लसित अनुपम-रत्न उपेत।अमर-निकेतन तुल्य हैं कविकुल कीर्ति-निकेत।4।
मानस-अभिनन्दन, अमर, नन्दन बन वर कुंज।है पावन प्रतिपति मय कवि पुंगव यश पुंज।5।
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