ग़ज़ल

एक तिनका

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' · सब कलाम देखें
मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ ।एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा ।आ अचानक दूर से उड़ता हुआ ।एक तिनका आँख में मेरी पड़ा ।1।
मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा ।लाल होकर आँख भी दुखने लगी ।मूँठ देने लोग कपड़े की लगे ।ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी ।2।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया ।तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए ।ऐंठता तू किसलिए इतना रहा ।एक तिनका है बहुत तेरे लिए ।3।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.