ग़ज़ल
एक बूँद
ज्यों निकल कर बादलों की गोद सेथी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ीसोचने फिर-फिर यही जी में लगी,आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी?
देव!! मेरे भाग्य में क्या है बदा,मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में?या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,चू पडूँगी या कमल के फूल में?
बह गयी उस काल एक ऐसी हवावह समुन्दर ओर आई अनमनीएक सुन्दर सीप का मुँह था खुलावह उसी में जा पड़ी मोती बनी।
लोग यों ही हैं झिझकते, सोचतेजबकि उनको छोड़ना पड़ता है घरकिन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हेंबूँद लौं कुछ और ही देता है कर।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.