बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
1897-1960
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
ओ असिधारा-पथ के गामी!
विकट सुभट तुम, अथक पथिक तुम कंटक-कीर्णित मग-अनुगामी
हम तो ओस-बिंदु सम ढरके
आए इस जड़ता में चेतन तरल रूप कुछ धर के!
सखि, वन-वन घन गरजे!
श्रवण निनादा-मगन
शरह जुन्हाई अब कहाँ, कहाँ बसन्त उछाह।
जीवन में अब बचि रह्यो, चिर निदाध कौ दाह।।91।।
जीवन-तरल-तरंगणी, सूखि भई कृश-धार।
द्वेष-मत्त जग ने दियौ, यह निदाध-उपहार।।1।।
दृग थाके अवलोकि कैं, मन अनन्त की लीक।
यह अहनिशि चलिबौ भयो, गति को स्वयं प्रतीक।।11।।
जब इतनौ पथ चलि चुके, तब जिय उठ्यो विचार।
यह प्रवास असफल भयौ, यह जीवन निस्तार।।21।।
परि कै सृजन प्रवाह में, हम पूछत हम कौन?
ऊतर में कहि जात कोउ, तुम बुद-बुद तुम पौन।।31।।
हमें बावरो कहत सब, जो हम जोहत बाट।
कहा कहैं? कछुपरि गई, ऐसी रेख ललाट।।41।।
ये तब मौन अधर खुलें, वा छिन अरे ‘नवीन’।
ता छिन पिय मुख परस तैं, हों तुव शब्द अदीन।।51।।
तुम्हैं खिझाय रिझाइबौ, दुलरैबो प्रतियाम।
सतत बलैया लेइबो, यही हमारो काम।।61।।
हम तो ढूँढ़त हैं पियहिं, गहरे पानी पैठि।
वै गहराई छाँड़ि कै, रहे किनारे बैठि।।71।।
लगी खबरिया चलि भए, ते पँचरंगी मीत।
या पँचरंगी जगत की, कहौ जु कौन प्रतीत।।81।।
विचरहु पिय की डगरिया, बसहु पिया के गाँव
पिय की ड्यौढ़ी बैठिकै, रटहु पिया कौ नांव।
इस धरती पर लाना है,
हमें खींच कर स्वर्ग
अरे ओ निरगुन फागुन मास!
मेरे कारागृह के शून्य अजिर में मत कर वास,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर,
विश्व-वेदना के कल जल से
बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले
भर-भरकर फिर-फिर सूखे हैं मेरे लोचन गीले-गीले।
मछली, मछली, कितना पानी? ज़रा बता दो आज,
देखूँ, कितने गहरे में है मेरा जीर्ण जहाज़।
मेह की झड़ी लगी नेह की घड़ी लगी।
हहर उठा विजन पवन,
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए,
कुछ धूमिल-सी कुछ उज्ज्वल-सी झिलमिल शिशिर-चाँदनी छाई
मेरे कारा के आँगन में उमड़ पड़ी यह अमल जुन्हाई।
आज सुना है सखी, हमारे साजन लेंगे जोग, री,
हमें दान में दे जाएँगे वे विकराल वियोग, री।
हम निकेतन, हम अनिकेतन
हम तो रमते राम हमारा क्या घर, क्या दर, कैसा वेतन?
आओ, बलिहारी जाऊँ, तुम झूलो आज हिंडोला,
मैं झोटे दूँ, तुम चढ़ जाओ, झूले पे अनबोले।