ग़ज़ल

ओस बिंदु सम ढरके

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' · सब कलाम देखें
हम तो ओस-बिंदु सम ढरकेआए इस जड़ता में चेतन तरल रूप कुछ धर के!
क्या जाने किसने मनमानी कर हमको बरसायाक्या जाने क्यों हमको इस भव-मरुथल में सरसायाबाँध हमें जड़ता बंधन में किसने यों तरसायाकौन खिलाड़ी हमको सीमा-बंधन दे हरषायाकिसका था आदेश कि उतरे हम नभ से झर-झरके?
आज वाष्प वन उड़ जाने की साध हिये उठ आईमन पंछी ने पंख तौलने की रट आज लगाईक्या इस अनाहूत ने आमंत्रण की ध्वनि सुन पाईअथवा आज प्रयाण-काल की नव शंख-ध्वनि छाई
मन पंछी ने पंख तौलने की रट आज लगाईक्या इस अनाहूत ने आमंत्रण की ध्वनि सुन पाईअथवा आज प्रयाण-काल की नव शंख-ध्वनि छाईलगता है मानो जागे हैं स्मरण आज नंबर के।
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