ग़ज़ल
फागुन
अरे ओ निरगुन फागुन मास!मेरे कारागृह के शून्य अजिर में मत कर वास,अरे ओ निरगुन फागुन मास!
यहाँ राग रस-रंग कहाँ है?झांझ न मदिर मृदंग यहाँ है,अरे चतुर्दिक फैल रही यहमौन भावना जहाँ-तहाँ है।इस कुदेश में मत आ तू रस-वश हँसता सोल्लास,अरे ओ भोले फागुन मास!
कोल्हू में जीवन के कण-कण,तैल-तैल हो जाते क्षण-क्षण।प्रतिदिन चक्की के धर्मट में-पिस जाता गायन का निक्वण,फाग सुहाग भरी होली का यहाँ कहाँ रस-रास?अरे ओ, मुखरित फागुन मास!
रामबांस की कठिन गांस में,मूँज-वान की प्रखर फांस में,अटकी हैं जीवन की घड़ियाँ,यहाँ परिश्रम-रुद्ध सांस में।यहाँ न फैला तू वह अपना लाल गुलाल-विलास,अरे, अरुणारे फागुन मास!
छाई जंज़ीरों की झन-झन,डंडा-बेड़ी की यह धन-धन,गर्रे का अर्राटा फैला,यहाँ कहाँ पनघट की खन-खन?कैसे तुझको यहाँ मिलेगा होली का आभास,अरे, हरियारे फागुन मास!
यह निर्बंध भावना ही की,चपल तरंगें अपने जी की,इन तालों-जंगलों के भीतर-घुँट-घुँट सतत हो गईं फीकी,अब तू क्यों मदमाता तांडव करता, रे, सायास?अरे, मतवाले फागुन मास?
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