ग़ज़ल
विप्लव गायन
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,जिससे उथल-पुथल मच जाए,एक हिलोर इधर से आए,एक हिलोर उधर से आए,
प्राणों के लाले पड़ जाएँ,त्राहि-त्राहि रव नभ में छाए,नाश और सत्यानाशों का -धुँआधार जग में छा जाए,
बरसे आग, जलद जल जाएँ,भस्मसात भूधर हो जाएँ,पाप-पुण्य सद्सद भावों की,धूल उड़ उठे दायें-बायें,
नभ का वक्षस्थल फट जाए-तारे टूक-टूक हो जाएँकवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,जिससे उथल-पुथल मच जाए।
माता की छाती का अमृत-मय पय काल-कूट हो जाए,आँखों का पानी सूखे,वे शोणित की घूँटें हो जाएँ,
एक ओर कायरता काँपे,गतानुगति विगलित हो जाए,अंधे मूढ़ विचारों की वहअचल शिला विचलित हो जाए,
और दूसरी ओर कंपा देनेवाला गर्जन उठ धाए,अंतरिक्ष में एक उसी नाशकतर्जन की ध्वनि मंडराए,
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,जिससे उथल-पुथल मच जाए,
नियम और उपनियमों के येबंधक टूक-टूक हो जाएँ,विश्वंभर की पोषक वीणाके सब तार मूक हो जाएँ
शांति-दंड टूटे उस महा-रुद्र का सिंहासन थर्राएउसकी श्वासोच्छ्वास-दाहिका,विश्व के प्रांगण में घहराए,
नाश! नाश!! हा महानाश!!! कीप्रलयंकारी आँख खुल जाए,कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओजिससे उथल-पुथल मच जाए।
सावधान! मेरी वीणा में,चिनगारियाँ आन बैठी हैं,टूटी हैं मिजराबें, अंगुलियाँदोनों मेरी ऐंठी हैं।
कंठ रुका है महानाश कामारक गीत रुद्ध होता है,आग लगेगी क्षण में, हृत्तलमें अब क्षुब्ध युद्ध होता है,
झाड़ और झंखाड़ दग्ध हैं -इस ज्वलंत गायन के स्वर सेरुद्ध गीत की क्रुद्ध तान हैनिकली मेरे अंतरतर से!
कण-कण में है व्याप्त वही स्वररोम-रोम गाता है वह ध्वनि,वही तान गाती रहती है,कालकूट फणि की चिंतामणि,
जीवन-ज्योति लुप्त है - अहा!सुप्त है संरक्षण की घड़ियाँ,लटक रही हैं प्रतिपल में इसनाशक संभक्षण की लड़ियाँ।
चकनाचूर करो जग को, गूँजेब्रह्मांड नाश के स्वर से,रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान हैनिकली मेरे अंतरतर से!
दिल को मसल-मसल मैं मेंहदीरचता आया हूँ यह देखो,एक-एक अंगुल परिचालनमें नाशक तांडव को देखो!
विश्वमूर्ति! हट जाओ!! मेराभीम प्रहार सहे न सहेगा,टुकड़े-टुकड़े हो जाओगी,नाशमात्र अवशेष रहेगा,
आज देख आया हूँ - जीवनके सब राज़ समझ आया हूँ,भ्रू-विलास में महानाश केपोषक सूत्र परख आया हूँ,
जीवन गीत भूला दो - कंठ,
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