ग़ज़ल

भिक्षा

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' · सब कलाम देखें
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर,विश्व-वेदना के कल जल सेआप्लावित कर दो अभ्यंतर,भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।
छलका दो मेरी वाणी मेंअचर-सचर की विगलित करुणासमवेदना-भावना से तुम कंपितकर दो यह हिय थर-थर,भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।
नभ-जल-थल से अनिल-अनल मेंकरुण मोहिनी छवि दिखला दो,पुलक-पुलक बह आने दो, प्रिय,मेरे नयनों का लघु निर्झर,भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।
इठलाते कुसुमों का मादकपरिमल मन-नभ में फैला है,अपनी निर्गुण गंध-किरण सेचिर निर्धूम करो मम अंबर,भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।
मेरी मुग्धा व्यथा परिधिगतहुई - उसे नि:सीम बना दो,मुक्त करो, प्रिय, मुक्त करो ममकरुणा-वीणा के ये सुस्वरभर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।
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