अमीर खुसरो

अमीर खुसरो

1253-1325
अमीर खुसरो एक महान सूफी संत, कवि और संगीतकार थे, जिन्हें 'तूती-ए-हिंद' (भारत का तोता) के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी और उर्दू के प्रारंभिक स्वरूप को गढ़ने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अपनी पहेलियों, मुकरियों और ग़ज़लों से जनमानस को मुग्ध किया। खुसरो की रचनाओं में भारतीय संस्कृति, सूफी रहस्यवाद और गंगा-जमुनी तहज़ीब का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
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Famous Works

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइकेबात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराए नैनाँ बनाए बतियाँ।कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाए छतियाँ॥
काहे को ब्याही बिदेस, सुन बाबुल मोरेभइयों को दीन्हे महलों दो-महले
ऐ री सखी मोरे पिया घर आएभाग लगे मोरे आँगन को
गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस॥
बहुत कठिन है डगर पनघट कीकैसे मैं भर लाऊँ मथवा पे मटकी
मोरा जोबना नवेलरा भयो है गुलालकैसे गर दीन्ही बकस मोरी माल
आज रंग है री माँ रंग है रीमेरे महबूब के घर रंग है री
मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रेघर नारी कँवारी कहे सो कहे
अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री, कि सावन आयाबेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री, कि सावन आया
एक थाल मोती से भरा,सब के सिर पर औंधा धरा।
बीसों का सिर काट लियाना मारा ना खून किया
श्याम बरन और दाँत अनेक,लचकत जैसे नारी।
तरवर से इक तिया उतरी, उसने बहुत रिझाया।बाप का नाम जो वासे पूछा, आधा नाम बताया।
अर्थ तो इसका बूझेगा,मुँह देखो तो सूझेगा।
तोरी सूरत के बलिहारी, निज़ामसब सखियन में चुनरी मेरी मैली
ख़बरम रसीद इम्शब कि निगार ख़्वाही आमदसर-ए-मन फ़िदा-ए-राही कि सवार ख़्वाही आमद