ग़ज़ल

ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल

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ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराए नैनाँ बनाए बतियाँ।कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाए छतियाँ॥
शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़, वा रोज़-ए-वस्लत चूँ उम्र कोताह।सखी पिया को जो मैं न देखूँ, तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ॥
यक़ायक अज़ दिल दो चश्म-ए-जादू, ब-सद फ़रेबम बबुर्द तस्कीं।किसे पड़ी है जो जा सुनावे, पियारे पी को हमारी बतियाँ॥
चूँ शम्अ सोज़ाँ चूँ ज़र्रा हैराँ, हमेशा गिर्याँ ब-इश्क़ आँ मह।न नींद नैनाँ न अँग चैनाँ, न आप आवें न भेजें पतियाँ॥
ब-हक़-ए-रोज़-ए-विसाल-ए-दिलबर, कि दाद मारा ग़रीब ख़ुसरौ।सपेट मन के वराए राखूँ, जो जाए पाऊँ पिया की खतियाँ॥