बिहारी

बिहारी

1595-1663
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान॥
केसरि से बरन सुबरन बरन जीत्यौ:::बरनीं न जाइ अवरन बै गई।
खेलत फाग दुहूँ तिय कौ मन राखिबै कौ कियौ दाँव नवीनौप्यार जनाय घरैंनु सौं लै, भरि मूँठि गुलाल दुहूँ दृग दीनौ
गाहि सरोवर सौरभ लै, ततकाल खिले जलजातन मैं कै।नीठि चलै जल वास अचै, लपटाइ लता तरु मारग मैं कै।
जाके लिए घर आई घिघाय, करी मनुहारि उती तुम गाढ़ीआजु लखैं उहिं जात उतै, न रही सुरत्यौ उर यौं रति बाढ़ी
जानत नहिं लगि मैं मानिहौं बिलगि कहै:::तुम तौ बधात ही तै वहै नाँध नाध्यौ है।
नील पर कटि तट जटनि दै मेरी आली,:::लटुन सी साँवरी रजनि सरसान दै,
पावस रितु बृन्दावनकी दुति दिन-दिन दूनी दरसै है।छबि सरसै है लूमझूम यो सावन घन घन बरसै है॥१॥
बिरहानल दाह दहै तन ताप, करी बड़वानल ज्वाल रदी।घर तैं लखि चन्द्रमुखीन चली, चलि माह अन्हान कछू जु सदी।
कोऊ कोरिक संग्रहौ कोऊ लाख हजार।मो सम्पति जदुपति सदा बिपति-बिदारनहार॥
बौरसरी मधुपान छक्यौ, मकरन्द भरे अरविन्द जु न्हायौमाधुरी कुंज सौं खाइ धका, परि केतकि पाँडर कै उठि धायौ
माहि सरोवर सौरभ लै, ततकाल खिले जलजातन मैं कैनीठि चलै जल वास अचै, लपटाइ लता तरु मारग मैं कै
मैं अपनौ मनभावन लीनों॥इन लोगनको कहा कीनों मन दै मोल लियो री सजनी।
रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ।प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी, जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ॥
वंस बड़ौ बड़ी संगति पाइ, बड़ाई बड़ी खरी यौ जग झेली।साँप फुकारन सीस रसारनु है सबसे जिय ऊपर खेली।
सौंह कियें ढरकौहे से नैन, टकी न टटै हिलकी हलियै।मुँह आगै हू आये न सूझयौ कछू ,सु कहयौ कछु ये सुति साँभल ए।
है यह आजु बसन्त समौ, सु भरौसो न काहुहि कान्ह के जी कौअंध कै गंध बढ़ाय लै जात है, मंजुल मारुत कुंज गली कौ
हो झालौ दे छे रसिया नागर पनाँ।साराँ देखे लाज मराँ छाँ आवाँ किण जतनाँ॥