अमीर मीनाई
1829-1900
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
अच्छे ईसाहो मरीज़ोंका ख़याल अच्छा है
हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है
अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ
वो बुत वफ़ा पे न आया मैं बे-वफ़ा न हुआ।
इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
ढूँढने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ
ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो
दिल में हज़ार दर्द उठे आँख तर न हो।
कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई
हाय कैसे इस भरी महफ़िल में रुसवाई हुई
कहा जो मैंने कि यूसुफ़ को ये हिजाब न था
तो हँस के बोले वो मुँह क़ाबिल-ए-नक़ाब न था।
जब से बुलबुल तूने दो तिनके लिये
टूटती है बिजलियाँ इनके लिये
झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का
नाज़ुक बहुत है फूल चराग़-ए-मज़ार का
तुन्द मय और ऐसे कमसिन के लिये
साक़िया हल्की-सी ला इन के लिये
ना शौक़ ए वस्ल का दावा ना ज़ौक ए आश्नाई का
ना इक नाचीज़ बन्दा और उसे दावा ख़ुदाई का
फ़िराक़-ए-यारने बेचैन मुझको रात भर रक्खा
कभी तकियाइधर रक्खा, कभी तकिया उधर रक्खा
1. उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो,
हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो।
बन्दा-नवाज़ियों पे ख़ुदा-ए-करीम था
करता न मैं गुनाह तो गुनाह-ए-अज़ीम था
सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता
हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी
क्यों तुम आसान समझते थे मुहब्बत मेरी
है दिल को शौक़ उस बुत-ए-क़ातिल की दीद का
होली का रंग जिस को लहू है शहीद का