ग़ज़ल
अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ
अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआवो बुत वफ़ा पे न आया मैं बे-वफ़ा न हुआ।
सर-ए-नियाज़ को तेरा ही आस्ताना हुआशराब-ख़ाना हुआ या क़िमार-ख़ाना हुआ।
हुआ फ़रोग़ जो मुझ को ग़म-ए-ज़माना हुआपड़ा जो दाग़ जिगर में चराग़-ए-ख़ाना हुआ।
उम्मीद जा के नहीं उस गली से आने कीब-रंग-ए-उम्र मिरा नामा-बर रवाना हुआ।
हज़ार शुक्र न ज़ाए हुई मिरी खेतीकि बर्क़ ओ सैल में तक़्सीम दाना दाना हुआ।
क़दम हुज़ूर के आए मिरे नसीब खुलेजवाब-ए-क़स्र-ए-सुलैमाँ ग़रीब-ख़ाना हुआ।
तिरे जमाल ने ज़ोहरा को दौर दिखलायातिरे जलाल से मिर्रीख़ का ज़माना हुआ।
कोई गया दर-ए-जानाँ पे हम हुए पामालहमारा सर न हुआ संग-ए-आस्ताना हुआ।
फ़रोग़-ए-दिल का सबब हो गई बुझी जो हवसशरार-ए-कुश्ता से रौशन चराग़-ए-ख़ाना हुआ।
जब आई जोश पे मेरे करीम की रहमतगिरा जो आँख से आँसू दुर-ए-यगाना हुआ।
हसद से ज़हर तन-ए-आसमाँ में फैल गयाजो अपनी किश्त में सरसब्ज़ कोई दाना हुआ।
चुने महीनों ही तिनके ग़रीब बुलबुल नेमगर नसीब न दो रोज़ आशियाना हुआ।
ख़याल-ए-ज़ुल्फ़ में छाई ये तीरगी शब-ए-हिज्रकि ख़ाल-ए-चेहरा-ए-ज़ख़्मी चराग़-ए-ख़ाना हुआ।
ये जोश-ए-गिर्या हुआ मेरे सैद होने परकि चश्म-ए-दाम के आँसू से सब्ज़ दाना हुआ।
न पूछ नाज़-ओ-नियाज़ उस के मेरे कब से हैंये हुस्न ओ इश्क़ तो अब है उसे ज़माना हुआ।
उठाए सदमे पे सदमे तो आबरू पाईअमीर टूट के दिल गौहर-ए-यगाना हुआ।
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