ग़ज़ल

ना शौक़ ए वस्ल का दावा

अमीर मीनाई · सब कलाम देखें
ना शौक़ ए वस्ल का दावा ना ज़ौक ए आश्नाई काना इक नाचीज़ बन्दा और उसे दावा ख़ुदाई का
कफ़स में हूँ मगर सारा चमन आँखों के आगे हैरिहाई के बराबर अब तस्सव्वुर है रिहाई का
नया अफ़साना कह वाइज़ तो शायद गर्म हो महफ़िलक़यामत तो पुराना हाल है रोज़ ए जुदाई का
बहार आई है अब अस्मत का पर्दाफ़ाश होता हैजुनूं का हाथ है आज और दामन पारसाई का
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