ग़ज़ल
ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो
ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न होदिल में हज़ार दर्द उठे आँख तर न हो।
मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीबदो-चार साल तक तो इलाही सहर न हो।
इक फूल है गुलाब का आज उन के हाथ मेंधड़का मुझे ये है कि किसी का जिगर न हो।
ढूँडे से भी न मअ'नी-ए-बारीक जब मिलाधोका हुआ ये मुझ को कि उस की कमर न हो।
उल्फ़त की क्या उम्मीद वो ऐसा है बेवफ़ासोहबत हज़ार साल रहे कुछ असर न हो।
तूल-ए-शब-ए-विसाल हो मिस्ल-ए-शब-ए-फ़िराक़निकले न आफ़्ताब इलाही सहर न हो।
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