सुंदरदास
1596-1689
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
एकनि के बचन सुनत अति सुख होई ,
फल से झरत हैं अधिक मनभावने.
गेह तज्यो अरु नेह तज्यो पुनि खेह लगाई कै देह संवारी .
मेह सहे सिर, सीत सहे तन धूप समै जो पंचागिनि बारी.
तेल जरै बाती जरै, दीपक जरै न कोइ।
दीपक जरताँ सब कहै, भारी अजरज होइ॥
गज अलि मीन पतंग मृग, इक-इक दोष बिनाश।
जाके तन पाँचौं बसै, ताकी कैसी आश॥
पति ही सूं प्रेम होय, पति ही सूं नेम होय,
पति ही सूं छेम होय , पति ही सूं रात है.
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की बुद्धि होय,
ना तौ मुख मौन गहि चुप होय रहिए.
ब्रह्म तें पुरुष अरु पकृति प्रगट भई,
प्रकृति तें महत्तत्व,पुनि अहंकार है .
सुनत नगारे चोट बिगसै कमलमुख,
अधिक उछाह फूल्यो मात है न तन में.