ग़ज़ल
ब्रह्म तें पुरुष अरु
ब्रह्म तें पुरुष अरु पकृति प्रगट भई,प्रकृति तें महत्तत्व,पुनि अहंकार है .अहंकार हू तें तीन गुन सत,रज,तम,तमहू तें महाभूत विषय पसर है .रजहू तें इंद्री दस पृथक पृथक भई,सत्तहू तें मद,आदि देवता विचार है .ऐसे अनुक्रम करि शिष्य सूँ कहत गुरु,सुंदर सकल यह मिथ्या भ्रमजार है .
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