ग़ज़ल
बोलिए तौ तब जब
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की बुद्धि होय,ना तौ मुख मौन गहि चुप होय रहिए.
जोरिए तो तब जब जोरिबे को रीति जाने,तुक छंद अरथ अनूप जामे लहिए .
गाईए तो तब जब गाईबे को कंठ होय ,श्रवन के सुनितहिं मनै जमे गहिए .
तुकभंग, छंदभंग, अरथ मिलै न कछु,सुंदर कहत ऐसी बानी नहिं कहिए .
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh