जिगर मुरादाबादी
1890-1960
अली सिकंदर जिगर मुरादाबादी उर्दू के प्रसिद्ध रोमांटिक शायर थे।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
अगर न ज़ोहरा जबीनों के दरमियाँ गुज़रे
तो फिर ये कैसे कटे ज़िन्दगी कहाँ गुज़रे
अब तो यह भी नहीं रहा अहसास
दर्द होता है या नहीं होता
अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं
फ़ैज़ाने-मोहब्बत आम सही, इर्फ़ाने-मोहब्बत आम नहीं
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त! घबराता हूँ मैं।
जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूँ मैं॥
आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था
आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था
आँखों में बस के दिल में समा कर चले गये
ख़्वाबिदा ज़िन्दगी थी जगा कर चले गये
आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है
इक लफ़्ज़े-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
इश्क़ की दास्तान है प्यारे
अपनी-अपनी ज़ुबान है प्यारे
इश्क़ को बे-नक़ाब होना था
आप अपना जवाब होना था
इश्क़ फ़ना का नाम है इश्क़ में ज़िन्दगी न देख
जल्वा-ए-आफ़्ताब बन ज़र्रे में रोशनी न देख
इश्क़ में लाजवाब हैं हम लोग
माहताब आफ़ताब हैं हम लोग
इश्क़ लामहदूद जब तक रहनुमा होता नहीं
ज़िन्दगी से ज़िन्दगी का हक़ अदा होता नहीं
इस इश्क़ के हाथों से हर-गिज़ नामाफ़र देखा
उतनी ही बड़ी हसरत जितना ही उधर देखा
इसी चमन में ही हमारा भी इक ज़माना था
यहीं कहीं कोई सादा सा आशियाना था
ओस पदे बहार पर आग लगे कनार में
तुम जो नहीं कनार में लुत्फ़ ही क्या बहार में
कब तक आख़िर मुश्किलाते-शौक़ आसाँ कीजिए
अब मोहब्बत को मोहब्बत पर ही क़ुर्बाँ कीजिए
कभी शाख़-ओ-सब्ज़-ओ-बर्ग पर कभी ग़ुँचा-ओ-गुल-ओ-ख़ार पर
मैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ मेरा हक़ है फ़सल-ए-बहार पर
कहाँ वो शोख़, मुलाक़ात ख़ुद से भी न हुई
बस एक बार हुई और फिर कभी न हुई
कहाँ से बढ़कर पहुँचे हैं कहाँ तक इल्म-ओ-फ़न साक़ी
मगर आसूदा इनसाँ का न तन साक़ी न मन साक़ी
काम आख़िर जज़्बा-ए-बेइख़्तियार आ ही गया
दिल कुछ इस सूरत तड़पा उनको प्यार आ ही गया
कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे
कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन
जह्ले-ख़िरद ने दिन ये दिखाए
घट गए इन्साँ बढ़ गए साए
ज़र्रों से बातें करते हैं दीवारोदर से हम।
मायूस किस क़दर है, तेरी रहगुज़र से हम॥
जान कर मिन-जुमला-ऐ-खासाना-ऐ-मैखाना मुझे
मुद्दतों रोया करेंगे जाम-ओ-पैमाना मुझे
लाखों में इंतिख़ाब के क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को तुमने देख लिया दिल बना दिया
तबीयत इन दिनों बेगा़ना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है
तुझी से इब्तिदा है तू ही इक दिन इंतिहा होगा
सदा-ए-साज़ होगी और न जाने साज-ए-बे-सदा होगा
तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई
वो ज़िंदगी तो मुहब्बत की ज़िंदगी न हुई!
दर्द बढ़ कर फुगाँ1 ना हो जाये
ये ज़मीं2 आसमाँ3 ना हो जाये
दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उनको सुनाई न गई
बात बिगड़ी थी कुछ ऐसी कि बनाई न गई
दिल को जब दिल से राह होती है
आह होती है वाह होती है
दिल को मिटा के दाग़े-तमन्ना दिया मुझे
ऐ इश्क़ तेरी ख़ैर हो ये क्या दिया मुझे