ग़ज़ल
इस इश्क़ के हाथों से हर-गिज़ नामाफ़र देखा
इस इश्क़ के हाथों से हर-गिज़ नामाफ़र देखाउतनी ही बड़ी हसरत जितना ही उधर देखा
था बाइस-ए-रुसवाई हर चंद जुनूँ मेराउनको भी न चैन आया जब तक न इधर देखा
यूँ ही दिल के तड़पने का कुछ तो है सबब आख़िरयाँ दर्द ने करवट ली है याँ तुमने इधर देखा
माथे पे पसीना क्यों आँखों में नमी सी क्योंकुछ ख़ैर तो है तुमने क्या हाल-ए-जिगर देखा
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