ग़ज़ल
कोई ये कह दे गुलशन-गुलशन
कोई ये कह दे गुलशन गुलशनलाख बलाएँ एक नशेमन
कामिल रेहबर क़ातिल रेहज़नदिल सा दोस्त न दिल सा दुशमन
फूल खिले हैं गुलशन गुलशनलेकिन अपना अपना दामन
उमरें बीतीं सदियाँ गुज़रींहै वही अब तक इश्क़ का बचपन
इश्क़ है प्यारे खेल नहीं हैइश्क़ है कार-ए-शीशा-ओ-आहन
खै़र मिज़ाज-ए-हुस्न की या-रबतेज़ बहुत है दिल की धड़कन
आज न जाने राज़ ये क्या हैहिज्र की रात और इतनी रोशन
आ कि न जाने तुझ बिन कल सेरूह है लाशा जिस्म है मदफ़न
तुझ सा हसीं और ख़ून ए मोहब्बतवहम है शायद सुर्ख़ी-ए-दामन
बर्क-ए-हवादिस अल्लाह अल्लाहझूम रही है शाख़-ए-नशेमन
तू ने सुलझ कर गेसू-ए-जानाँऔर बढ़ा दी शौक़ की उलझन
रहमत होगी तालिब-ए-इस्याँरश्क करेगी पाकिए-दामन
दिल कि मुजस्सम आईना-सामाँऔर वो ज़ालिम आईना-दुश्मन
बैठे हम हर बज़्म में लेकिनझाड के उट्ठे अपना दामन
हस्ती-ए-शाएर अल्लाह अल्लाहहुश्न की मंज़िल इश्क़ का मस्कन
रंगीं फितरत सादा तबीअतफ़र्श-नशीं और अर्श-नशेमन
काम अधूरा और आज़ादीनाम बड़े और थोड़े दर्शन
शमअ है लेकिन धुंधली धुंधलीसाया है लेकिन रोशन रोशन
काँटों का भी हक़ है कुछ आखि़रकौन छुड़ाए अपना दामन
चलती फिरती छाँव है प्यारेकिस का सहरा कैसा गुलशन
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