ग़ज़ल
अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं
अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहींफ़ैज़ाने-मोहब्बत आम सही, इर्फ़ाने-मोहब्बत आम नहीं
ये तूने कहा क्या ऐ नादाँ फ़ैयाज़ी-ए-क़ुदरत आम नहींतू फ़िक्रो-नज़र तो पैदाकर, क्या चीज़ है जो इनआम नहीं
यारब ये मुकामे-इश्क़ है क्या गो दीदा-ओ-दिल नाकाम नहींतस्कीन है और तस्कीन नहीं आराम है और आराम नहीं
आना है जो बज़्मे-जानाँ में पिन्दारे-ख़ुदी को तोड़ के आऐ होशो-ख़िरद के दीवाने याँ होशो-ख़िरद का काम नहीं
इश्क़ और गवारा ख़ुद कर ले बेशर्त शिकस्ते-फ़ाश अपनीदिल की भी कुछ उनके साज़िश है तन्हा ये नज़र का काम नहीं
सब जिसको असीरी कहते हैं वो तो है असीरी ही लेकिनवो कौन-सी आज़ादी है जहाँ, जो आप ख़ुद अपना दाम नहीं
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