बृज नारायण चकबस्त
1882-1926
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे,
साक़िया जाते हैं, महफ़िल तेरी आबाद रहे।
कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पै भी
पर अब उरूज वो इल्मो कमालो फ़न में नहीं ।
कहते हैं जिसे अब्र वो मैख़ाना है मेरा
जो फूल खिला बाग़ में पैमाना है मेरा ।
ज़ुबाँ को बन्द करें या मुझे असीर करें
मेरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते ।
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होना
आदमियत यही है और यही इन्साँ होआ
तेरा बन्दा रहे दिल से यही पैमान रहा,
तायरे फ़िक्र तेरे औज से हैरान रहा
हो चुकी क़ौम के मातममें बहुत सीनाज़नी
अब हो इस रंग का सन्यासये है दिल में ठनी
फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना
अजल क्या है खुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना
फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए
बहार आलमे फ़ानी रहे रहे न रहे ।
रुख़्सत हुआ वो बाप से लेकर ख़ुदा का नाम
राह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम
रुखसत हुआ वो बाप से ले कर खुदा का नाम
राह-ए-वफ़ा की मन्ज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम
शायद खिज़ाँ से शक्ल अयाँ हो बहार की
कुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार की
ये गुफ़्तगू ज़रा न हुई माँ पे कारगर
हँस कर वुफ़ूर-ए-यास से लड़के पे की नज़र
ज़मीन हिन्द की रुतबे में अर्शआला है
ये होमरूल की उम्मीद का उजाला है