ग़ज़ल

कहते हैं जिसे अब्र वो मैख़ाना है मेरा

बृज नारायण चकबस्त · सब कलाम देखें
कहते हैं जिसे अब्र वो मैख़ाना है मेराजो फूल खिला बाग़ में पैमाना है मेरा ।
क़ैफ़ीयते गुलशन है मेरे नशे का आलमकोयल की सदा नार-ए-मस्ताना है मेरा ।
पीता हूँ वो मैं नशा उतरता नहीं जिसकाखाली नहीं होता है वो पैमाना है मेरा ।
दरिया मेरा आईना है लहरें मेरे गेसूऔर मौज नसीमे सहरी शाना है मेरा ।
मैं दोस्त भी अपना हूँ अदू भी हूँ मैं अपनाअपना है कोई और न बेगाना है मेरा ।
ख़ामोशी में याँ रहता है तफ़सीर का आलममेरे लबे ख़ामोश पै अफ़साना है मेरा ।
मिलता नहीं हर एक को वो नूर है मुझमेंजो साहबे बी निश है वो परवाना है मेरा ।
शायर का सख़ुन कम नहीं मज़ज़ूब की बड़ सेहर एक न समझेगा वो अफ़साना है मेरा ।
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