जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद

1889-1937
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Famous Works

अरुण यह मधुमय देश हमारा।जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
आह! वेदना मिली विदाईमैंने भ्रमवश जीवन संचित,
कानन-कुसुम -पुन्य औ पाप न जान्यो जात।
तुम कनक किरन के अंतराल मेंलुक छिप कर चलते हो क्यों ?
शरद का सुंदर नीलाकाशनिशा निखरी, था निर्मल हास
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारतीस्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
बीती विभावरी जाग री!अम्बर पनघट में डुबो रही
हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहारउषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार
सब जीवन बीता जाता हैधूप छाँह के खेल सदॄश