ग़ज़ल
दो बूँदें
शरद का सुंदर नीलाकाशनिशा निखरी, था निर्मल हासबह रही छाया पथ में स्वच्छसुधा सरिता लेती उच्छ्वासपुलक कर लगी देखने धराप्रकृति भी सकी न आँखें मूँदसु शीतलकारी शशि आयासुधा की मनो बड़ी सी बूँद!
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