ग़ज़ल
बीती विभावरी जाग री
बीती विभावरी जाग री!
अम्बर पनघट में डुबो रहीतारा-घट ऊषा नागरी!
खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहाकिसलय का अंचल डोल रहालो यह लतिका भी भर लाई-मधु मुकुल नवल रस गागरी
अधरों में राग अमंद पिएअलकों में मलयज बंद किएतू अब तक सोई है आलीआँखों में भरे विहाग री!
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