ग़ज़ल

आह ! वेदना मिली विदाई

जयशंकर प्रसाद · सब कलाम देखें
आह! वेदना मिली विदाईमैंने भ्रमवश जीवन संचित,मधुकरियों की भीख लुटाई
छलछल थे संध्या के श्रमकणआँसू-से गिरते थे प्रतिक्षणमेरी यात्रा पर लेती थीनीरवता अनंत अँगड़ाई
श्रमित स्वप्न की मधुमाया मेंगहन-विपिन की तरु छाया मेंपथिक उनींदी श्रुति में किसनेयह विहाग की तान उठाई
लगी सतृष्ण दीठ थी सबकीरही बचाए फिरती कब कीमेरी आशा आह! बावलीतूने खो दी सकल कमाई
चढ़कर मेरे जीवन-रथ परप्रलय चल रहा अपने पथ परमैंने निज दुर्बल पद-बल परउससे हारी-होड़ लगाई
लौटा लो यह अपनी थातीमेरी करुणा हा-हा खातीविश्व! न सँभलेगी यह मुझसेइसने मन की लाज गँवाई
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