अल्ताफ़ हुसैन हाली
1837-1914
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद
ख़ुद-ब-ख़ुद, दिल में है इक शख़्स समाया जाता
ऐ इश्क़! तूने अक्सर क़ौमों को खा के छोड़ा
जिस घर से सर उठाया उस घर को खा के छोड़ा
जहाँ में ‘हाली’ किसी पे अपने सिवा भरोसा न कीजिएगा
ये भेद है अपनी ज़िन्दगी का बस इसकी चर्चा न कीजिएगा
धूम थी अपनी पारसाई की
की भी और किससे आश्नाई की
बढ़ाओ न आपस में मिल्लत ज़ियादा
मुबादा कि हो जाए नफ़रत ज़ियादा
1.आगे बढ़े न किस्सा-ए-इश्क़-ए-बुतां से हम,
सब कुछ कहा मगर न खुले राजदां से हम।
हक वफ़ा का जो हम जताने लगे
आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे
है जुस्तजू कि ख़ूब से है ख़ूबतर कहाँ
अब ठहरती है देखिये जाकर नज़र कहाँ